Saturday, May 16, 2015

प्रेम मुक्तिदायी है!

Master says:
                       "प्रेम में ईर्ष्या हो तो प्रेम ही नहीं है; फिर प्रेम के नाम से कुछ और ही रोग चल रहा है। ईर्ष्या सूचक है प्रेम के अभाव की। यह तो ऐसा ही हुआ, जैसा दीया जले और अँधेरा हो। दीया जले तो अँधेरा होना नहीं चाहिए। अँधेरे का न हो जाना ही दीए के जलने के जलने का प्रमाण है। ईर्ष्या का मिट जाना ही प्रेम का प्रमाण है। ईर्ष्या अँधेरे जैसी है; प्रेम प्रकाश जैसा है। इसको कसौटी समझना।

जब तक ईर्ष्या रहे तब तक समझना कि प्रेम प्रेम नहीं। तब तक प्रेम के नाम से कोई और ही खेल चल रहा है; अहंकार कोई नई यात्रा कर रहा है- प्रेम के नाम से दूसरे पर मालकियत करने का मजा, प्रेम के नाम से दूसरे का शोषण, दूसरे व्यक्ति का साधन की भांति उपयोग। और दूसरे व्यक्ति का साधन की भाँति उपयोग जगत में सबसे बड़ी अनीति है। क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति साध्य है, साधन नहीं।
तो भूल कर भी किसी का उपयोग मत करना। किसी के काम आ सको तो ठीक, लेकिन किसी को अपने काम में मत ले आना। इससे बड़ा कोई अपमान नहीं है कि तुम किसी को अपने काम में ले आओ। इसका अर्थ हुआ कि परमात्मा को सेवक बना लिया। सेवक बन सको तो बन जाना, लेकिन सेवक बनाना मत।
असली प्रेम उसी दिन उदय होता है जिस दिन तुम इस सत्य को समझ पाते हो कि सब तरफ परमात्मा विराजमान है। तब सेवा के अत‍िरिक्त कुछ बचता नहीं। प्रेम तो सेवा है, ईर्ष्या नहीं। प्रेम तो समर्पण है, मालकियत नहीं।"

          प्रेम मुक्तिदायी है! लेकिन जिसे हम प्रेम कहते है वह तो बंधन बन जाता है! वह तो जंजीरे ढलता है! जिसे हम प्रेम कहते है वह तो कारागृह है; उसमें दो व्यक्ति निरंतर संघर्ष में लगे रहते है कि कौन जीते, कौन हारे! जिसे हम प्रेम कहते है वे तो एक सतत कलह है! संवाद भी नहीं है, बस विवाद है!
प्रेम के नाम से जगत में कुछ और ही चल रहा है! कुछ झूठ, कुछ कृत्रिम! और कारण उसका है कि हम बचपन से ही प्रेम को झूठ करने का आयोजन करते है! छोटे -छोटे बच्चो से हम कहते है! प्रेम करो, मैं तुम्हारी मां हूं! प्रेम करो, मैं तुम्हारा पिता हूं! प्रेम करो, यह तुम्हारा भाई है! प्रेम करो, यह तुम्हारी बहन है! जैसे प्रेम भी किया जा सकता है! जैसे प्रेम भी किसी के हाथ में है!
तो बच्चा क्या करें? अगर हम उससे आग्रह करते है---और हम बलशाली है; बच्चे का जीवन हमारे हाथ में है; बच्चे को बचना है तो हमारे साथ चलना होगा-तो बच्चा क्या करे? कहां से प्रेम लाए? घर में जो नया-नया बच्चा पैदा हुआ है उससे घृणा पैदा होती है बड़े बच्चे को, प्रेम नहीं! वह शत्रु की तरह मालूम पड़ता है, मित्र की तरह नही! क्योंकि वह मां का ध्यान आकर्षित करेगा! अब तक जो बच्चा मां के ध्यान का केंद्र था वह परिधि पर हट जाएगा, नया बच्चा केंद्र पर होगा! वह नये बच्चे की ज्यादा देखभाल करेगी, सेवा-शत्रुता करेगी, चिंता करेगी!

Jocks चंदूलाल मारवाड़ी

आखिरी सवाल: भगवान, मेरे पिताजी आप पर बहुत नाराज हैं। आपके विचारों से तो सहमत हैं। यहां तक कि संन्यास भी लेना चाहते हैं। नाराजगी का कारण है, आपके चंदूलाल मारवाड़ी के लतीफे। मेरे पिताजी मारवाड़ी हैं और उनका नाम चंदूलाल है!

विजय!
यह तो बड़ा तुमने अच्छा किया, याद दिला दी। यह आठ-दस दिन से मैं चंदूलाल को बिलकुल भूला ही हुआ था। और तुम्हारे पिताजी हैं, सो तो स्वभावतः अब कभी नहीं भूलूंगा। तुम्हारे पिताजी के लिए कुछ लतीफे।

न्यायाधीश ने अदालत के कठघरे में खड़े सेठ चंदूलाल से कहा, इतनी छोटी सी बात के आधार पर, सेठ, तलाक नहीं दिया जा सकता। क्या तुम्हारे पास कोई ठोस प्रमाण भी हैं जिनसे पता चले कि तुम्हारी पत्नी तुम्हारे प्रति वफादार नहीं?
चंदूलाल ने कहा, एक नहीं हजारों प्रमाण हैं, माई लार्ड! कल की ही रात की बात है। यह रात को तीन घंटे गायब रही। और पूछने पर सफाई पेश करने लगी कि मैं अपनी सहेली गुलजान के साथ सिनेमा देखने गई थी।
जज ने पूछा, मगर तुम्हें यह कैसे पता चला कि तुम्हारी पत्नी झूठ बोल रही थी?
चंदूलाल ने कहा, क्योंकि कल रात को मैं तो खुद ही गुलजान के साथ सिनेमा देखने गया था! अब आप स्वयं सोचिए कि यह औरत मेरे साथ सरासर धोखा कर रही है या नहीं!
तुम्हारे पिताजी हैं तो मैं क्या करूं विजय, आदमी वे गजब के हैं!

फजलू अपने साथ पढ़ने वाली रीता नामक एक लड़की पर फिदा हो गया। एक दिन यह पता लगा कर कि वह किस मोहल्ले में रहती है, फजलू वहां जा पहुंचा। अब मुश्किल यह थी कि उसका घर कैसे ढूंढा जाए! फजलू ने सामने से चले आ रहे एक वृद्ध सज्जन से पूछा, दादा जी, क्या आपको पता है कि रीता कहां रहती है? मैं उसका भाई हूं। लेकिन पांच-छह सालों के बाद इस शहर में आया हूं। अतः पहचान नहीं पा रहा हूं कि उसका मकान कौन सा है। सब बदला-बदला नजर आ रहा है!
उस बूढ़े आदमी ने फजलू के कंधे पर हाथ रख कर कहा, तुमसे मिल कर बड़ी प्रसन्नता हुई बेटे। मैं रीता का बाप सेठ चंदूलाल मारवाड़ी हूं!
एक मोटा व्यक्ति समुद्रतट पर बैठा सामने की ओर देख रहा था, जहां जवान लड़कियां अल्प वस्त्रों में व्यायाम कर रही थीं। पास से गुजरते हुए दूसरे मोटे व्यक्ति ने कहा, आपका क्या खयाल है सेठ चंदूलाल! क्या इससे वजन घटता है?
चंदूलाल ने जवाब दिया, क्यों नहीं! इसी दृश्य को देखने के लिए तो मैं रोज सुबह तीन मील चल कर आता हूं! अरे, वजन क्यों नहीं घटेगा? घटता है।

सेठ चंदूलाल मारवाड़ी ने अपने दोस्त ढब्बूजी को बताया कि मेरी पत्नी कपड़ों के पीछे दीवानी है। जब देखो तब कपड़ों की मांग करती रहती है। सुबह से शाम तक एक ही रट लगाए रखती है कि नए कपड़े चाहिए। मैं तो यह सुन-सुन कर घनचक्कर हुआ जा रहा हूं। शादी को बीस साल हो गए, एक दिन ऐसा नहीं होता, जब वह कपड़ों की रट न लगाती हो। बस कपड़े! कपड़े! कपड़े!
ढब्बूजी बोले, आश्चर्य की बात है! आखिर वह इतने कपड़ों का करती क्या है?
चंदूलाल ने कहा, मुझे क्या पता! मैंने तो आज तक एक भी कपड़ा खरीद कर दिया नहीं। अरे, जब दहेज में मिले वस्त्रों में सब आराम से चल रहा है, तो नए कपड़ों में भला क्यों पैसा व्यर्थ किया जाए! कल फिर मुझसे कहने लगी कि अब तो कपड़े नाम-मात्र को ही बचे हैं। पड़ोस के छोकरे खिड़की में से झांक-झांक कर तमाशा देखते हैं! अब तो कुछ करो, मोहल्ले भर में हंसी होती है!
ढब्बूजी ने पूछा, तो फिर तुमने कुछ किया?
सेठ चंदूलाल बोले, और भला क्या करता! यही किया कि एक पुरानी साड़ी का पर्दा बना कर खिड़की पर लटका दिया।
पहुंचे हुए व्यक्ति हैं तुम्हारे पिताजी, विजय!

नसरुद्दीन आफिस गया था और फजलू स्कूल। गुलजान घर में अकेली थी। दोपहर को नसरुद्दीन के दोस्त सेठ चंदूलाल आए और धीरे-धीरे बातों ही बातों में एक हजार रुपए के बदले में गुलजान को अपना स्त्रीत्व बेचने के लिए फुसलाने लगे। कुछ समय तक आनाकानी करने के बाद गुलजान तैयार हो गई। चंदूलाल ने उसे नगद एक हजार रुपयों का बंडल थमा दिया।
शाम को नसरुद्दीन ने आफिस से आते ही पूछा, अरे, आज क्या मेरा दोस्त चंदूलाल आया था? उसकी छड़ी वहां कोने में टिकी है। लगता है छड़ी भूल गया!
गुलजान को तो पसीना छूट गया। मगर अब क्या कर सकती थी, कोने में छड़ी टिकी तो थी। बोली, हां, आज दोपहर को आया था।
मुल्ला ने कहा, गजब हो गया। मारवाड़ी से ऐसी आशा न थी। क्या वह पूरे एक हजार रुपए दे गया?
यह सुन कर तो गुलजान पर जैसे बिजली गिर पड़ी हो। घबड़ाहट में उसके मुंह से निकल गया, हां, पूरे एक हजार।
नसरुद्दीन ने खुशी से उछलते हुए कहा, मान गया मैं भी कि मारवाड़ी भी वायदे के पक्के होते हैं। पिछले महीने उसने एक हजार रुपए उधार लिए थे और वचन दिया था कि ठीक एक माह में आज की ही तारीख को लौटा दूंगा!

तुम घबड़ाओ मत विजय, अपने पिताजी को घर लौट कर कहना कि मैं तो चंदूलाल के लतीफे कहना बंद नहीं कर सकता, एक तरकीब है आसान। वे आ जाएं और संन्यासी हो हो जाएं। उनका नाम बदल दूंगा।

ऊर्जा

Master says....
भोजन से ऊर्जा मिलती है...
नींद मे ऊर्जा संग्रहित होती है...
जागरण में खर्च होती है...
प्राणायाम और व्यायाम से जागती...
धारणा से केन्द्रित होती...
ध्यान से ऊपर चढ़ती...
भय से सिकुड़ती...
वासना में नीचे गिरती...
प्रेम में फैैलती, विस्तृत होती...
और समाधि में विराट के साथ एक होती है, उसमें विलीन होती हैै...

शिष्य होना दुर्लभ है।

Master says...
गुरु तो कोई भी होना चाहता है, शिष्य होना दुर्लभ है। जो तुम नहीं जानते, वह भी तुम दावा करते हो जानने का, क्योंकि जानने के दावे में अहंकार की तृप्ति है। जिन बातों का तुम्हें कोई भी पता नहीं है, उनका भी तुम उत्तर देते हो; क्योंकि यह तुम कैसे मानो कि उत्तर, और तुम्हें पता नहीं! तुम ऐसी सलाहें देते हो, जिन्हें कोई माने तो गड्डे में गिरेगा, क्योंकि तुम किसी अनुभव से सलाह नहीं दे रहे हो। तुम तो सलाह देने का मजा ले रहे हो।

देखा लोगों को, सलाह देने में कैसा मजा लेते हैं! फंस भर जाओ उनके चंगुल में, और हर कोई सलाह देने को उत्सुक है। वह तो अच्छा है कि लोग सलाह लेते नहीं। दुनिया में सबसे ज्यादा दी जानी वाली चीज सलाह है, और सबसे कम ली जाने वाली चीज भी सलाह है। कौन सुनता है? कौन लेता है पू अच्छा है कि लोग लेते नहीं अन्यथा लोग पागल हो जायें। सलाह देने वाले इतने हैं, मार्गदर्शक इतने हैं!

बच्चों की परवरिश

Master says....
मां-बाप अक्सर बच्चों को लेकर चिंतित रहते हैं कि आज के भ्रष्ट वातावरण में बच्चों की परवरिश कैसे की जाए? कैसे उन्हें समाज में व्याप्त बुराइयों से बचाकर भलाई की ओर ले जाया जाए? बच्चे बहुत बड़ी जिम्मेदारी हैं, जो जीवन ने माता-पिता पर सौंपी है। इससे पहले कि आप सोचें कि बच्चों को कैसा बनाया जाए, हमेशा यह सोचना चाहिए कि खुद को कैसा बनाया जाए? स्मरण रखें कि बदलाव की शुरुआत हमेशा खुद से होती है। अगर माता-पिता के खुद के व्यक्तित्व का ठीक-ठीक निर्माण हुआ हो, तो जीवन के जिन सूत्रों से उन्होंने खुद को निर्मित किया है, उन्हीं सूत्रों के आधार पर दूसरों का निर्माण किया जा सकता है। ओशो से यह प्रश्न अक्सर पूछा जाता कि हम बच्चों को बुराई से कैसे बचाएं? ओशो ने इसके लिए कुछ सूत्र दिए हैं, जिन पर हर माता-पिता को ध्यान देना चाहिए :
कोई मां अपने बच्चों को अंतर्मुखी बनाना चाहे, चरित्रवान बनाना चाहे, तो इस भूल में कभी न पड़े कि वह सीधे-सीधे बच्चे को इस दिशा में ले जा सकती है। क्योंकि जब भी हम किसी व्यक्ति को किसी दिशा में ले जाने लगते हैं, तो उसका अहंकार हमारे विरोध में खड़ा हो जाता है। मन का एक वैज्ञानिक नियम है कि जिस बात के लिए इनकार किया जाता है, वही आकर्षक मालूम होती है। इसलिए परोक्ष रूप से, सहजता से अपने अनुभव को बांटें, उपदेश या आदेश देकर यह काम नहीं हो सकता।
छोटे बच्चे का बहुत आदर करें, क्योंकि जिसका हम आदर करते हैं, उसको ही अपने हृदय के निकट ला पाते हैं। बच्चे को तभी सिखाया जा सकता है, जब आप उससे प्रेम करें। अगर हम चाहते हैं कि छोटे बच्चे मां-बाप का आदर करें, तो पहले उन्हें आदर देना पड़ेगा। आप बच्चों में जिन गुणों की अपेक्षा करते हैं, क्या वे गुण आप में हैं? पहले खुद चरित्रवान बनिए, बच्चे अपने आप आपका अनुकरण करेंगे।