Wednesday, October 28, 2015

महावीर और गौतम

Iमहावीर की मृत्यु का दिन आया। महावीर का सबसे प्रमुख शिष्य गौतम पास के ही गांव में उपदेश देने गया था। महावीर ने जान कर ही भेजा था।

महावीर अस्वस्थ थे—छह महीने से अस्वस्थ थे। दिया टिमटिमाता—टिमटिमाता सा था। कब ज्योति उड़ जाएगी, कोई कह नहीं सकता था। सारे शिष्य इकट्ठे हो गए थे, दूर—दूर से आ गए थे, सैकड़ों मील की यात्रा करके महावीर के अंतिम दर्शन को उपस्थित हो गए थे।

और गौतम, जो कि जीवन भर साथ रहा; जो छाया की तरह साथ रहा; जिसने महावीर की वैसी अथक सेवा की, जैसी शायद ही कभी किसी ने किसी की होगी—एक ही दिन पहले महावीर ने उससे कहा गौतम, तू पास के गांव में जा। भिक्षा भी मांग लाना और गांव के लोगों को उपदेश भी दे आना। महावीर ने जान कर ही गौतम को भेजा।

सोच—समझ कर भेजा। एक उपाय की भांति भेजा।

गौतम तो दूसरे गांव गया और महावीर ने देह छोड़ दी। जब गौतम वापस आ रहा था तो रास्ते पर राहगीरों ने गौतम से कहा कि अब कहां जा रहे हो, अब किसके लिए जा रहे हो? दीया तो बुझ गया! पिंजड़ा पड़ा है, पक्षी तो उड़ गया। फूल तो धूल में गिर गया, सुवास आकाश में समा गई। अब कहां जा रहे हो?

गौतम तेजी से चला जा रहा था। महावीर बीमार हैं। भेजा था तो आज्ञा पूरी करनी थी, लेकिन जल्दी भिक्षा मांग, जल्दी उपदेश दे, भाग रहा था कि वापस पहुंच जाए। वहीं बैठ कर रोने लगा।

और उसने उन यात्रियों से पूछा कि एक बात भर मुझे पूछनी है अंतिम समय में उन्होंने मुझे स्मरण किया था या नहीं? और यदि स्मरण किया था तो मेरे लिए कोई संदेश छोड़ गए हैं या नहीं?

उन यात्रियों ने कहा हां, अंतिम संदेश तुम्हारे लिए ही छोड़ गए हैं। कहा कि गौतम को मैंने दूर भेजा है, क्योंकि पास रहते—रहते वह भूल ही गया था कि एक होना है। इतने पास था कि उसे विस्मरण हो गया था कि एक होना है। उसे दूरी की याद दिलाने के लिए, कि पास भी एक दूरी है, मैंने दूर भेजा है।

और यह मेरा सूत्र है, गौतम को कह देना, कि हे गौतम, तू पूरी नदी तो तैर गया, अब किनारे पर आकर क्यों रुक गया है? पूरी नदी तो तैर चुका, अब किनारे को भी छोड़! अब किनारे से भी उठ आ!

जैसे कोई आदमी नदी पार कर जाए और फिर किनारे को पकड़ कर भी नदी में ही बना रहे — इस आशा में कि अब तो किनारा मिल गया, अब क्या करना है! मगर है वह नदी में ही, किनारे को पकड़े है।

महावीर के संदेश का अर्थ था गौतम, तूने सब छोड़ दिया— घर—द्वार, परिवार—सब छोड़ कर तू मेरे साथ हो लिया। लेकिन अब तूने मुझे पकड़ लिया है। अब तू सोचता है कि अब मुझे क्या करना है!

अब सदगुरु मिल गए, अब उनकी सेवा करता हूं। मेरा काम पूरा हो गया। अब तू किनारे को पकड़ कर रुक गया है। मुझे भी छोड़ दे!

क्योंकि बाहर कुछ भी पकड़ो तो बंधन है। अंतत: सदगुरु भी बंधन बन जाता है। सदगुरु और सारे बंधनों से छुड़ा देता है और अंत में स्वयं से भी छुड़ा देता है। वही सदगुरु है।

इस वचन को सुनते ही गौतम समाधि को उपलब्ध हो गया। जो समाधि जीवन भर छलती रही, वह एक क्षण में उपलब्ध हो गई। चोट गहरी थी। आघात ऐसा था कि पहुंच गया होगा प्राणों के अंतरतम तक।

सरल ध्यान विधि


‘अ, से अंत होने वाले किसी शब्द का
उच्चार चुपचाप करो।’
बाहर जाने वाली श्वास पर जोर दो।
और तुम इस विधि का उपयोग मन में
अनेक परिवर्तन लाने के लिए कर सकते हो।
अगर तुम कब्जियत से पीड़ित हो
तो श्वास लेना भूल जाओ,
सिर्फ श्वास को बाहर फेंको।
श्वास भीतर ले जाने का काम
शरीर को करने दो,
तुम छोड़ने भर का काम करो।
तुम श्वास को बाहर निकाल दो
और भीतर ले जाने की फिक्र ही मत करो।
शरीर वह काम अपने आप ही कर लेगा,
तुम्हें उसकी चिंता नहीं लेनी है।
उससे तुम मर नहीं जाओगे।
शरीर ही श्वास को भीतर ले जाएगा।
तुम छोड़ने भर का काम करो,
शेष शरीर कर लेगा।
और तुम्हारी कब्जियत जाती रहेगी।
अगर तुम हृदय—रोग से पीड़ित हो
तो श्वास को बाहर छोड़ो,
लेने की फिक्र मत करो।
फिर हृदय—रोग तुम्हें कभी नहीं होगा।
अगर सीढ़ियां चढ़ते हुए या
कहीं जाते हुए तुम्हें थकावट महसूस हो,
तुम्हारा दम घुटने लगे तो तुम इतना ही करो :
श्वास को बाहर छोड़ो,
लो नहीं।
और तब तुम कितनी ही सीढ़ियां चढ़ जाओगे
और नहीं थकोगे।
क्या होता है?
जब तुम श्वास छोड़ने पर जोर देते हो
तो उसका मतलब है
कि तुम अपने को छोड़ने को,
अपने को खोने को राजी हो,
तब तुम मरने को राजी हो।
तब तुम मृत्यु से भयभीत नहीं हो।
और यही चीज तुम्हें खोलती है,
अन्यथा तुम बंद रहते हो।
भय बंद करता है।
जब तुम श्वास छोड़ते हो
तो पूरी व्यवस्था बदल जाती है
और वह मृत्यु को स्वीकार कर लेती है।
भय जाता रहता है
और तुम मृत्यु के लिए राजी हो जाते हो।
और वही व्यक्ति जीता है
जो मरने के लिए तैयार है।
सच तो यह है कि वही जीता है
जो मृत्यु से राजी है।
केवल वही व्यक्ति जीवन के योग्य है,
क्योंकि वह भयभीत नहीं है।
जो व्यक्ति मृत्यु को स्वीकार करता है,
मृत्यु का स्वागत करता है,
मेहमान मानकर उसकी
आवभगत करता है,
उसके साथ रहता है,
वही व्यक्ति जीवन में
गहरे उतर सकता है।
श्वास बाहर छोड़ो,
लेने की फिक्र मत करो
और तुम्हारा समस्त चित्त
रूपांतरित हो जाएगा।
इन सरल विधियों के कारण ही
तंत्र प्रभावी नहीं हुआ।
क्योंकि हम सोचते हैं कि
हमारा मन तो इतना जटिल है,
वह इन सरल विधियों से कैसे बदलेगा।
मन जटिल नहीं है,
मन मूढ़ भर है।
और मूढ़ बड़े जटिल होते हैं।
बुद्धिमान व्यक्ति सरल होता है।
तुम्हारे चित्त में कुछ भी जटिल नहीं है,
वह एक बहुत सरल यंत्र है।
अगर तुम उसे समझोगे तो
बहुत आसानी से उसे बदल सकते हो।
जब एक कुत्ता मरता है
तो दूसरे कुत्तों को कभी यह
आभास नहीं होता
कि हमारी मृत्यु भी होगी।
जब भी मरता है,
कोई दूसरा मरता है,
तो कोई कुत्ता कैसे कल्पना करे
कि मैं भी मरने वाला हूं।
उसने कभी अपने को मरते नहीं देखा,
सदा किसी दूसरे को ही मरते देखा है।
वह कैसे कल्पना करे,
कैसे निष्पत्ति निकाले कि मैं भी मरूंगा?
पशु को मृत्यु का बोध नहीं है,
इसी लिए कोई पशु
संसार का त्याग नहीं करता।
कोई पशु संन्यासी नहीं हो सकता।
केवल एक बहुत ऊंची कोटि की चेतना ही
तुम्हें संन्यास की तरफ ले जा सकती है।
मृत्यु के प्रति जागने से ही
संन्यास घटित होता है।
और अगर आदमी होकर भी तुम
मृत्यु के प्रति जागरूक नहीं हो
तो तुम अभी पशु ही हो,
मनुष्य नहीं हुए हो।
मनुष्य तो तुम तभी बनते हो
जब मृत्यु का साक्षात्कार करते हो।
अन्यथा तुममें और पशु में कोई फर्क नहीं है।
पशु और मनुष्य में सब कुछ समान है,
सिर्फ मृत्यु फर्क लाती है।
मृत्यु का साक्षात्कार कर लेने के बाद
तुम पशु नहीं रहे।
तुम्हें कुछ घटित हुआ है
जो कभी किसी पशु को घटित नहीं होता है।
अब तुम एक भिन्न चेतना हो..
जब श्वास बाहर जा रही है,
जब तुम जीवन से सर्वथा रिक्त हो,
तब तुम मृत्यु को छूते हो,
तब तुम उसके बहुत करीब पहुंच जाते हो।
तब तुम्हारे भीतर सब कुछ मौन
और शांत हो जाता है।
इसे मंत्र की तरह उपयोग करो।
जब भी तुम्हें थकावट महसूस हो,
तनाव महसूस हो तो
अ: से अंत होने वाले किसी शब्द का उच्चार करो।
अल्लाह से भी काम चलेगा—
कोई भी शब्द जो तुम्हारी श्वास को समग्रत:
बाहर ले आए,
जो तुम्हें श्वास से बिलकुल खाली कर दे।
जिस क्षण तुम श्वास से रिक्त होते हो
उसी क्षण तुम जीवन से भी
रिक्त हो जाते हो।
और तुम्हारी सभी समस्याएं
जीवन की समस्याएं हैं,
मृत्यु की कोई समस्या ही नहीं है।
तुम्हारी चिंताएं,
तुम्हारे दुख—संताप,
तुम्हारा क्रोध,
सब जीवन की समस्याएं हैं।
मृत्यु तो समस्याहीन है,
मृत्यु असमस्या है।
मृत्यु कभी किसी को समस्या नहीं देती है।
तुम भला सोचते हो कि मैं मृत्यु से डरता हूं
कि मृत्यु समस्या पैदा करती है,
लेकिन हकीकत यह है कि मृत्यु नहीं,
जीवन के प्रति तुम्हारा आग्रह,
जीवन के प्रति तुम्हारा लगाव
समस्या पैदा करता है।
जीवन ही समस्या खड़ी करता है,
मृत्यु तो सब समस्याओं का
विसर्जन कर देती है।
तो जब श्वास बिलकुल बाहर निकल जाए—
अ:ऽऽ—तुम जीवन से रिक्त हो गए।
उस क्षण अपने भीतर देखो,
जब श्वास बिलकुल बाहर निकल जाए।
दूसरी श्वास लेने के पहले
उस अंतराल में गहरे उतरो जो रिक्त है
और उसके आंतरिक
मौन और शांति के प्रति सजग होओ।
उस क्षण तुम बुद्ध हो।

भक्ति

भक्ति जब भोजन में प्रवेश करती है,
भोजन " प्रसाद "बन जाता है.।

भक्ति जब भूख में प्रवेश करती है,
भूख " व्रत " बन  जाती है.।

भक्ति जब पानी में प्रवेश करती है,
पानी " चरणामृत " बन जाता है.।

भक्ति जब सफर में प्रवेश करती है,
सफर " तीर्थयात्रा " बन जाता है.।

भक्ति जब संगीत में प्रवेश करती है,
संगीत " कीर्तन " बन जाता है.।

भक्ति जब घर में प्रवेश करती है,
घर " मन्दिर " बन जाता है.।

भक्ति जब कार्य में प्रवेश करती है,
कार्य " कर्म " बन जाता है.।

भक्ति जब क्रिया में प्रवेश करती है,
क्रिया "सेवा " बन जाती है.।
और...
भक्ति जब व्यक्ति में प्रवेश करती है,
व्यक्ति " मानव " बन जाता है..।

Thursday, September 17, 2015

अप्रसन्नता

यदि तुम अप्रसन्न हो तो इसका सरल सा अर्थ यहहै कि तुम अप्रसन्न होने की तरकीब सीख गए हो। और कुछ नहीं! अप्रसन्नता तुम्हारे मन के सोचने के ढंग पर निर्भर करतीहै। यहां ऐसे लोग हैं जो हर स्थिति में अप्रसन्न होते हैं। उनके मन में एक तरह का कार्यक"महै जिससे वे हर चीज को अप्रसन्नता में बदल देते हैं। यदि तुम उन्हें गुलाब की सुंदरता के बारे में कहो, वे तत्काल कांटों की गिनती शुरू कर देंगे। यदि उन्हें तुम कहो, "कितनी सुंदर सुबहहै, कितना उजला दिनहै!' वे कहेंगे, "दो अंधेरी रातों के बीच एक दिन, तो इतनी बड़ी बात क्यों बना रहे हो?'ली इसी बात को विधायक ढंग से भी देखा जा सकताहै; तब अचानक हर रात दो दिनों से घिर जातीहै। और अचानक चमत्कार होताहै कि गुलाब संभव होताहै। इतने सारे कांटों के बीच इतना नाजुक फूल संभव हुआ!

सब इस बात पर निर्भर करताहै कि किस तरह के मन का ढांचा तुम लिए हुए हो। लाखों लोग सूली लिए घूम रहे हैं। स्वाभाविक ही, निश्चित रूप से, वे बोझ से दबे हैं; उनका जीवन बस घिसटना मात्रहै। उनका ढांचा ऐसाहै कि हर चीज तत्काल नकारात्मक की तरफ चली जातीहै। यह नकारात्मक को बहुत बड़ा कर देताहै। जीवन के प्रति यह रुग्ण, विक्षिप्त, रवैयाहै। लेकिन वे सोचते चले जाते हैं कि "हम क्या कर सकते हैं? दुनिया ऐसी हीहै।'

नहीं, दुनिया ऐसी नहींहै! दुनिया पूरी तरह से तटस्थहै। इसमें कांटे हैं, इसमें गुलाब के फूल हैंै, इसमें रातें हैं, इसमें दिन भी हैं। दुनिया पूरी तरह से तटस्थहै, संतुलित--इसमें सब कुछहै। अब यह तुम्हारे ऊपर निर्भर करताहै कि तुम क्या चुनते हो। इसी तरह से लोग इसी पृथ्वी पर नर्क और स्वर्ग दोनों ही पैदा करते हैं।

संकल्पों से ऊर्जा


              बहुत छोटे छोटे संकल्पों का प्रयोग करना चाहिए और छोटे  छोटे संकल्पों से ऊर्जा इकट्ठी करनी चाहिए। और हमें जिंदगी में बहुत मौके हैं। आप कार में बैठे जा रहे हैं। आप इतना ही संकल्प कर ले सकते हैं कि आज मैं रास्ते के किनारे लगे बोर्ड नहीं पढूंगा। इसमें किसी का कोई हर्जा नहीं हुआ जा रहा है। इससे किसी का कोई नुकसान फायदा कुछ भी नहीं हो रहा है। लेकिन आपके संकल्प के लिए मौका मिल जाएगा और किसी को कहने की भी कोई जरूरत नहीं। यह आपकी भीतरी यात्रा है कि आप कहते हैं कि मैं यह नहीं पढूंगा आज, जो किनारे पर बोर्ड लगे हैं। और आप पाएंगे कि आधा घंटा कार में बैठना व्यर्थ नहीं गया। जितने आप कार में बैठे थे, उससे कुछ ज्यादा होकर कार के बाहर उतरे हैं। आपने कुछ उपलब्ध किया, जब कि आप ऐसे बैठकर कुछ भी खोते। यह सवाल बड़ा नहीं है कि आप कहां प्रयोग करते हैं। मैं उदाहरण के लिए कह रहा हूं। कुछ भी प्रयोग कर सकते हैं। जिस प्रयोग से भी आपके संकल्प को ठहरने की सामर्थ्य बढ़ती हो, उसे आप कर सकते हैं। ऐसे छोटे छोटे प्रयोग करते रहें।

      अब एक आदमी को हम कहते हैं कि ध्यान में चालीस मिनट’ आंख ही बंद रखो। तीन दफे वह आंख खोलकर देख लेता है बीच में। अब यह आदमी संकल्पहीन है, आत्महीन है। आंख बंद करने का बड़ा फायदा और नुकसान नहीं है। लेकिन चालीस मिनट तय किया तो यह आदमी चालीस मिनट आंख भी नहीं बंद रख सकता, तो और इससे बहुत आशा रखना कठिन है। इस आदमी से हम कह रहे हैं कि दस मिनट गहरी श्वास लो। वह दो मिनट के बाद ही धीमी श्वास लेने लगता है। फिर उससे कहो गहरी श्वास लो, फिर एकाध  दो गहरी श्वास लेता है, फिर धीमी लेने लगता है। वह आत्मवान नहीं है। दस मिनट गहरी श्वास लेना कोई बड़ी कठिन बात नहीं है। और सवाल यह नहीं है कि दस मिनट गहरी श्वास लेने से क्या मिलेगा कि नहीं मिलेगा। एक बात तय है कि दस मिनट गहरी श्वास के संकल्प करने से यह आदमी आत्मवान हो जाएगा। इसके भीतर कुछ सघन हो जाएगा। यह किसी चीज को जीतेगा, किसी रेसिस्टेंस को तोड़ेगा। और वह जो वैगरेंट माइंड है, वह जो आवारा मन है, वह आवारा मन कमजोर होगा। क्योंकि उस मन को पता चलेगा कि इस आदमी के साथ नहीं चल सकता। इस आदमी के साथ जीना है, तो इस आदमी की माननी पड़ेगी।