Saturday, May 16, 2015

धर्म ओर हम

Master says....कभी आपने देखा होगा, कोई आदमी एक मशाल हाथ में ले ले और जोर से घुमाने लगे, तो एक फायर सर्किल बन जाता है, एक अग्नि—वृत्त बन जाता है। दिखाई पड़ने लगता है कि आग का एक गोल घेरा है। गोल घेरा कहीं भी नहीं है, सिर्फ एक मशाल है जो जोर से घूम रही है। अगर आप पास जाकर गौर से देखें, तो गोल घेरा मिट जाएगा, रह जाएगी मशाल। लेकिन तेजी से घूमने की वजह से मशाल गोल घेरा मालूम होती है आग का। दूर से देखने पर लगता है कि आग का वृत्त है, गोल घेरा है। है कहीं भी नहीं, लेकिन दिखाई पड़ता है। लेकिन अगर निकट जाकर पहचानें, तो पता चलेगा कि जोर से घूमती हुई मशाल है। वृत्त झूठ है, अग्नि—वृत्त झूठ है। ऐसे ही ये भीतर अगर हम गौर से जाकर देखेंगे, तो पता चलेगा कि मैं बिलकुल ही झूठ है। तेजी से घूमती हुई चेतना के कारण मैं का भ्रम पैदा हो जाता है, जैसे तेजी से घूमती हुई मशाल के कारण वृत्त का भ्रम पैदा हो जाता है। यह एक वैज्ञानिक सत्य है, जो समझ लेना चाहिए।

शायद आपको खयाल भी न हो कि हमारे जीवन के सारे भ्रम तेजी से घूमने के भ्रम हैं। दीवाल ठोस दिखाई पड़ती है, पत्थर पड़ा है पैर के नीचे, कितना साफ और ठोस है। लेकिन वैज्ञानिक कहते हैं कि ठोस पत्थर जैसी कोई चीज है ही नहीं। तब तो हम बड़ी मुश्किल में पड़ जाएंगे। क्या आपको पता है कि वैज्ञानिक मैटर के, पदार्थ के जितने ही पास गया, उतना ही पदार्थ विलीन हो गया। जब तक दूर था, तो समझता था कि पदार्थ है। और सबसे ज्यादा वैज्ञानिक ही घोषणा करता था कि पदार्थ ही सत्य है। लेकिन अब वैज्ञानिक ही कहता है कि पदार्थ तो है ही नहीं। तेजी से घूमते हुए विद्युत—क्या इतनी तेजी से घूम रहे हैं कि उनकी तेजी से घूमने की वजह से ठोसपन का भ्रम पैदा होता है। ठोसपन कहीं भी नहीं है।

जैसे बिजली का पंखा जोर से घूमता है तो उसकी तीन पंखुड़ियां दिखाई नहीं पड़ती हैं। फिर कोई गिनकर बता नहीं सकता है कि पंखुड़ियां कितनी हैं। और तेजी से घूमे, और तेजी से घूमे तो फिर हमें लगेगा कि एक टीन का गोल चक्कर घूम रहा है। फिर पंखुड़ियां दिखाई ही नहीं पड़ेगी। इतने तेजी से भी घुमाया जा सकता है उसे कि आप उसके ऊपर बैठ जाएं और आपको ऐसा पता न लगे कि पंखुड़ियां बीच से आ रही हैं, जा रही हैं। आपको ऐसा ही लगेगा कि मैं किसी ठोस चीज पर बैठा हुआ हूं। अगर इतनी तेजी से घूमे कि एक पंखुड़ी जाए, उसके पहले दूसरी पंखुड़ी आपके नीचे आ जाए, तो आपको कभी पता नहीं चलेगा कि आपके बीच —बीच में खड्डे भी आते हैं। पंखा इतनी तेजी से घूमे तो आपको पता नहीं चलेगा।

पदार्थ में उतनी ही तेजी से घूम रहे हैं उसके कण। और कण पदार्थ नहीं है, कण सिर्फ विद्युत ऊर्जा है, इलेक्ट्रिक इनर्जी है, वह तेजी से घूम रही है। घूमने की वजह से ठोसपन का भाव दे रही है। सारा पदार्थ सिर्फ तेजी से घूमती हुई ऊर्जा का फल है। दिखाई पड़ता है, है कहीं भी नहीं। ठीक ऐसे ही चित्त की ऊर्जा, इनर्जी आफ काशसनेस इतनी तेजी से घूम रही है कि मैं का भ्रम पैदा होता है।

दो भ्रम हैं जगत में, एक पदार्थ का भ्रम, मैटर का भ्रम और दूसरा मैं का भ्रम, ईगो का, अहंकार का भ्रम। ये दोनों भ्रम एकदम ही झूठे हैं, लेकिन इनके पास जाने से पता चलता है कि ये नहीं हैं। विज्ञान पदार्थ के पास गया तो पदार्थ विलीन हो गया। और धर्म मैं के पास गया, तो मैं विदा हो गया। धर्म की खोज है कि मैं नहीं है और विज्ञान की खोज है कि पदार्थ नहीं है। जितने निकट जाते हैं, उतना ही भ्रम टूट जाता है।

तो इसलिए मैं कहता हूं कि भीतर जाएं, निकट करीब से भीतर देखें, वहा कोई मैं है? और मैं नहीं कहता कि— ऐसा मान लें कि मैं नहीं हूं। अगर मान लिया तो झूठ हो जाएगा। मैं नहीं कहता हूं। मेरी बात अगर मानकर आप चल गए और आप ऐसा सोचने लगे कि मैं नहीं हूं, अहंकार झूठ है, मैं तो आत्मा हूं, मैं तो ब्रह्म हूं अहंकार नहीं है, तो आप गड़बड़ में पड़ गए। क्योंकि आप यह दोहरा रहे हैं तो फिर यह झूठ ही दोहराएंगे आप। मैं यह नहीं कहता हूं कि आप ऐसा दोहराएं। मैं यह कहता हूं कि आप भीतर जाएं, देखें, पहचानें। जो पहचानता है, देखता है, वह पाता है कि मैं नहीं हूं। फिर कौन है? जब मैं नहीं हूं कोई तो है। मेरे न होने से कोई भी नहीं है, ऐसा नहीं। क्योंकि भ्रम को जानने के लिए भी कोई तो चाहिए। भ्रम भी पैदा हो जाए, इसके लिए कोई तो चाहिए।

मैं नहीं हूं, फिर कौन है? फिर जो शेष रह जाता है, उसका अनुभव ही परमात्मा का अनुभव है। लेकिन उसका अनुभव एकदम विस्तीर्ण हो जाता है। मेरे गिरते ही तू भी गिर जाता है, वह भी गिर जाता है, फिर एक सागर ही रह जाता है चेतना का। उस स्थिति में दिखाई पड़ेगा कि परमात्मा ही है। तब तो शायद यह कहना भी गलत मालूम पड़े कि परमात्मा ही है। क्योंकि यह कहना भी पुनरुक्ति है। जब हम कहते हैं गाड इज, ईश्वर है, तो हम पुनरुक्ति कर रहे हैं। पुनरुक्ति इसलिए कर रहे हैं कि जो है, उसी का दूसरा नाम ईश्वर है। है का ही दूसरा नाम ईश्वर, है। इसलिए ईश्वर है, ऐसा एक ही चीज को दोहराना है, यह टोटॉलाजी है। एक ही बात को दोबारा कहना है। ठीक नहीं है यह बात।

ईश्वर है का क्या मतलब? हम है उस चीज को कहते हैं जो नहीं है भी हो सकती हो। हम कहते हैं, टेबिल है, क्योंकि कल टेबिल नहीं हो सकती है और कल टेबिल नहीं थी। जो चीज नहीं थी, फिर नहीं हो सकती है, उसको है कहने का कोई मतलब है। लेकिन ईश्वर न तो ऐसा है कि कभी नहीं था और न ऐसा हो सकता है कि कभी नहीं होगा। उसे है कहने का कोई भी मतलब नहीं। वह है हां, असल में जो है, उसका ही वह दूसरा नाम है। होने का ही दूसरा नाम परमात्मा है। एक्सिस्टेंस, अस्तित्व का ही दूसरा नाम परमात्मा है।

मेरी दृष्टि में, अगर हमने इस जो है, इस पर अपने परमात्मा को थोपा तो हम झूठ में उतर जाएंगे। और ध्यान रहे, परमात्मा भी अपने — अपने ट्रेड मार्क के अलग— अलग हैं। हिंदू का अपना है थोपने के लिए, मुसलमान का अपना है, ईसाई का अपना है, जैन का अपना है, बौद्ध का अपना है। सबके अपने— अपने शब्द हैं, अपने — अपने परमात्मा हैं। परमात्मा का भी बड़ा गृह उद्योग खुला हुआ है। अपने — अपने घर में परमात्मा को डाला जा सकता है। होम इंडस्ट्री है उसकी। अपने — अपने घर में ढालो, अपने — अपने परमात्मा का निर्माण करो।

और फिर ये परमात्माओं को ढालने वाले वैसे ही बाजार में लड़ते हैं, जैसे सभी अपने — अपने घर में सामान डालने वाले बाजार में, दुकानों पर लड़ते हैं। ऐसे बाजार में वे भी लड़ते हुए दिखाई पड़ते हैं। एक —दूसरे का परमात्मा भी भिन्न पड़ जाता है। असल में जब तक मैं हूं तब तक मैं जो भी करूंगा वह आपसे भिन्न होगा। जब तक मैं हूं, मेरा धर्म भिन्न होगा, मेरा ईश्वर भिन्न होगा, क्योंकि वे मेरे मैं के निर्माण होंगे। मैं भिन्न हूं इसलिए मेरा सब भिन्न होगा।

अगर दुनिया में ठीक—ठीक धर्म —निर्माण करने की स्वतंत्रता हो तो जितने आदमी हैं, उतने ही धर्म होंगे। इससे कम नहीं हो सकते। वह तो ठीक—ठीक स्वतंत्रता नहीं है।`

प्रेम अभय है।

��⛵एक युवक अपनी नववधु के साथ समुद्र-यात्रा पर था। सूर्यास्त हुआ, रात्रि का घना अंधकार छा गया और फिर एकाएक जोरों का तूफान उठा। यात्री भय से व्याकुल हो उठे। प्राण संकट में थे और जहाज अब डूबा, तब डूबा होने लगा। किंतु वह युवक जरा भी नहीं घबड़ाया।

उसकी पत्नी ने आकुलता से पूछा, 'तुम निश्चिंत क्यों बैठे हो? देखते नहीं कि जीवन बचने की संभावना क्षीण होती जा रही है! 'उस युवक ने अपनी म्यान से तलवार निकाली और पत्नी की गर्दन पर रखकर कहा, 'क्या तुम्हें डर लगता है?'

वह युवती हँसने लगी और बोली, 'तुमने यह कैसा ढोंग रचा? तुम्हारे हाथ में तलवार हो, तो भय कैसा!' वह युवक बोला, 'परमात्मा के होने की जब से मुझे गंध मिली है, तब से ऐसा ही भाव मेरा उसके प्रति भी है, तो भय रह ही नहीं जाता है।'

प्रेम अभय है। अप्रेम भय है। जिसे भय से ऊपर उठना हो, उसे समस्त के प्रति प्रेम से भर जाना होगा। चेतना के इस द्वार से प्रेम भीतर आता है, तो उस द्वार से भय बाहर हो जाता है। "

भोजन के साथ बेहोशी क्यों आ जाती है?


Master says ...भोजन के साथ बेहोशी क्यों आ जाती है?
क्योंकि जैसे ही पेट में भोजन जाता है, मस्तिष्क में जो ऊर्जा साधारणतः काम करती है--जो शक्ति, वह पेट खींच लेता है।
क्योंकि पेट को पचाने की जरूरत पड़ती है, तो सारे शरीर से शक्ति को पेट खींच लेता है
क्योंकि भोजन को पचाना है, पेट की अग्नि को ठीक से जलना है।
और मस्तिष्क बड़ी सूक्ष्म शक्ति से चलता है। होश सूक्ष्मतम शक्ति है।
जैसे ही पेट में भोजन गया कि मस्तिष्क की शक्ति पेट की तरफ उतर जाती है। बस, सिर झपकी खाने लगता है, नींद आने लगती है।
वह जो नींद आ रही है, वह इस बात का सबूत है कि जो शक्ति मस्तिष्क को चलने के लिए चाहिए, वह नहीं मिल रही।
और पेट शरीर का केंद्र है।
मस्तिष्क से शक्ति ली जा सकती है। मस्तिष्क को शक्ति तो पेट तभी देता है, जब उसके पास अतिरिक्त होती है। मस्तिष्क गौण है पेट के लिये।
इसलिये ज्यादा भोजन करने वाले लोग बहुत प्रखर बुद्धि के नहीं होते।
और एक बड़ी हैरानी की बात है कि ज्यादा भोजन करने वाले लोग न तो प्रखर बुद्धि के होते हैं और न ज्यादा जीते हैं; जल्दी मर जाते हैं।

Tuesday, April 16, 2013

@@@@@@@ IF - KAS @@@@@@@


meri jidngi me 1 kas tum ho
kas me ho pata waha jaha tum the
kas me mil pata jab tum sarir me the
kas me tumhe sun pata jab ye sab pehli bar tum bol rahe the
kas me tumhare pero ki dhul mathe pe le pata
kas tumhare sathe do kadam chal pata
kas tumhare sath do tuk bate ho pati
kas tumhari aakho me zankh ke khusi ke aansu se bhigh pata
kas tumhe me apna sab kuchh de pata
kas tumhare liye me bhi kuchh kar pata
jab tum is grah ki mulakat ke lie aaye th

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in my life u r one "IF"
IF I CAN STAY WHERE U ARE 
IF I CAN MEET U WHEN U ARE IN BODY 
IF I CAN HEAR YOU WHEN U SAY ALL FIRST TIME 
IF I CAN TAKE BLESINGS WITH TOUCH UR FEET 
IF I CAN WALK WITH U TWO STEAPS
IF I CAN TALK WITH U TWO WORDS
IF I CAN SEE IN UR EYES AND CRY WITH BLESSING OF HAPPYNESS
IF I CAN GIVE U WT I HAVE
IF I CAN DO FOR U SOMETHING
WHEN U ARE HEAR TO VISIT THIS PLANET 
IFFFFFFFFFFFFFFFFFFFFFFFFFFF......... ...
kassssssssssssssssssssssss 
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