Master says...
हम जानते हैं कि जुनून क्या
है इसलिए ये जानना
मुश्किल नहीं है कि करुणा
क्या होती है। जुनून का
मतलब है एक जैविक बुखार
की स्थिति; ये गर्म होती
है। आप जैविक, अवचेतन
ऊर्जा से भरे हैं। आप अपने
मालिक नहीं बल्कि
आपअपने दास हैं।
करुणा का मतलब है कि आप
ने जैविक और शारीरिक
हालातों को पार कर
लिया है। अब आप दास
नहीं बल्कि मालिक हो
गए हैं। अब आप चेतना के
साथ काम करते हैं। आप
किन्हीं अवचेतन शक्तियों
द्वारा संचालित, खींचे
और धक्का नहीं दिए जाते
हैं। आप खुद तय कर सकते हैं
कि आप अपनी ऊर्जा का
क्या करना चाहते हैं। आप
पूरी तरह से स्वतंत्र हैं।
तब वही ऊर्जा जो जुनून है
करुणा में बदल जाती है।
जुनून एक लालसा है जबकि
करुणा प्रेम है। जुनून एक
इच्छा है, करुणा
इच्छाहीनता है। जुनून
लालच है, करुणा
हिस्सेदारी है। जुनून
दूसरों को एक साधन के
तौर पर इस्तेमाल करना
चाहता है जबकि करुणा
दूसरों के व्यक्तित्व को
मान कर उसका सम्मान
करती है। जुनून आपको
पृथ्वी और कीचड़ तक ही
सीमित रखता है और आप
कभी भी कमल नहीं बन
पाते। करुणा आप को कमल
बना देती है। आप चाहत,
लालच और क्रोध की
कीचड़ की दुनिया से ऊपर
उठना शुरू कर देते हैं।
करुणा आपकी ऊर्जा का
परिवर्तन है।
सामान्य तौर पर आप
बिखरे और बंटे हुए हैं।
आपकी ऊर्जा, आपके क्रोध,
लालच, वासना और दूसरी
चीजों में बर्बाद हो
जाती है। आप खाली हो
जाते हैं।
आपकी सारी ऊर्जा बह
जाती है। यदि ये सारी
ऊर्जाबर्बाद नहीं होती,
तो वह आपके अस्तित्व को
भरना शुरू कर देती है। आप
पूर्ण हो जाते हैं। आपके
भीतर एक प्रकाश पैदा
होता है। जब आप उसमें
बहना शुरू कर देते हैं तो
आप बुद्ध बन जाते हैं। आप
एक कभी खत्म न होने वाले
स्रोत पर पहुंच जाते हैं।
करुणा मुख्य शब्द है लेकिन
आप इसे तभी समझ पाएंगे
जब आप गहरे ध्यान में
जाएंगे। जुनून को करुणा में
बदलने के लिए ध्यान कुंजी
है। आपको ज्यादा सचेत
बनना होगा। अभी आप
अवचेतन की स्थिति में हैं।
हम रोबोट की तरह
जीवन जीते हैं। आप जितने
अच्छे रोबोट हैं आप उतने
बेहतर तरीके से काम करते
हैं, आपके साथ समाज उतना
ही अच्छा महसूस करता है-
क्योंकि ये मशीनों का
समाज है। जागरूक बनने,
सतर्क होने के लिहाज से
सचेत होना खतरनाक है। ये
अंधे लोगों का समाज है।
आंखें रखने का मतलब है खतरे
को आमंत्रण देना।
लेकिन जागरूकता को
बढ़ाए बिना आप कभी भी
सुंदर वरदानों को, जिन्हें
सृष्टि ने आपको प्रदान
किया है, जानने में सक्षम
नहीं हो पाएंगे। आप कभी
भी उस महान अवसर को
नहीं समझ पाएंगे जो
आपको आगे बढ़ने के लिए
मिला है। आप सूर्य के
प्रकाश से भरी पर्वत की
चोटी हो सकते हैं लेकिन
आप केवल अंधेरी गुफा हैं।
सुकरात कहते हैं कि “अगर
आपको मालूम है कि आपको
जानकारी नहीं है तो यह
एक महान शुरुआत है। इसके
बाद आपके लिए जानकारी
प्राप्त करना संभव हो
जाता है।” ये समझना
कि‘मैं अज्ञानी हूं’ अपने
भीतर की सच्चाई और
अपने सच को खोजने और
जानने की संभावना को
बढ़ा देता है।
करुणा जुनून का आखिरी
पड़ाव है। आप जुनून में हैं
लेकिन आप सोचते रहते हैं
कि आप जैसे हैं वो ठीक है।
आप खुद का बचाव करते हैं।
अगर कोई चीज आपके
आरामदायक और तकनीकी
जीवन के खिलाफ होती है
तो आप उसका विरोध शुरू
कर देते हैं।
जब आप मेरे पास आते हैं तो
जागरूक बन कर नहीं आते हैं
इसलिए आते हैं ताकि आप
सुंदर और मीठे सपने देख
सकें। ये आप के आने का
उद्देश्य होता है लेकिन
हमारे यहां होने का ये
उद्देश्य नहीं है। एक बार
आप यहां आते हैं और पकड़
लिए जाते हैं। फिर धीरे-
धीरे मैं आपके सपनों को
बाहर निकालना शुरू कर
देता हूं। उसके बाद धीरे-
धीरे आपके भ्रमों को
तोड़ता हूं। एक बार आपके
भ्रम दूर हो जाते हैं, तो
आपके सपने भी चकनाचूर
हो जाते हैं और इसके बाद
एक महान ज्ञान आपके
लिए इंतजार कर रहा
होता है। एक ऐसा ज्ञान
जो आपको बुद्ध बना देता
है और करुणामय कर देता
है।
Everything starts with love, remember; love is the ultimate law. Then prayer, mercy, grace, follow of their own accord.
Saturday, May 16, 2015
जुनून और करुणा
सेक्स
Master says...लेकिन मैं जिस सेक्स की बात कर रहा हूं, वह तीसरा तल है। वह न आज तक पूरब में पैदा हुआ है, न पश्चिम में। वह तीसरा तल है स्प्रिचुअल, वह तीसरा तल है, अध्यात्मिक। शरीर के तल पर भी एक स्थिरता है। क्योंकि शरीर जड़ है। और आत्मा के तल पर भी स्थिरता है, क्योंकि आत्मा के तल पर कोई परिवर्तन कभी होता ही नहीं। वहां सब शांत है, वहां सब सनातन है। बीच में एक तल है मन का जहां पारे की तरह तरल है मन। जरा में बदल जाता है।
पश्चिम मन के साथ प्रयोग कर रहा है इसलिए विवाह टूट रहा है। परिवार नष्ट हो रहा है। मन के साथ विवाह और परिवार खड़े नहीं रह सकते। अभी दो वर्ष में तलाक है, कल दो घंटे में तलाक हो सकता है। मन तो घंटे भर में बदल जाता है। तो पश्चिम का सारा समाज अस्त-व्यस्त हो गया है। पूरब का समाज व्यवस्थित था। लेकिन सेक्स की जो गहरी अनुभूति थी, वह पूरब को अपलब्ध नहीं हो सकी।
एक और स्थिरता है, एक और घड़ी है अध्यात्म की। उस तल पर जो पति-पत्नी एक बार मिल जाते है या दो व्यक्ति एक बार मिल जाते है। उन्हें तो ऐसा लगता है कि वे अनंत जन्मों के लिए एक हो गये। वहां फिर कोई परिवर्तन नहीं है। उस तल पर चाहिए स्थिरता। उस तल पर चाहिए अनुभव।
तो मैं जिस अनुभव की बात कर रहा हूं,जिस सेक्स की बात कहर रहा हूं। वह स्प्रिचुअल सेक्स हे। अध्यात्मिक अर्थ नियोजन करना चाहता हूं काम की वासना में। और अगर मेरी यह बात समझेंगे तो आपको पता चल जायेगा। कि मां का बेटे के प्रति जो प्रेम है, वह आध्यात्मिक काम है। वह स्प्रिचुअल सेक्स का हिस्सा है। आप कहेंगे यह तो बहुत उलटी बात है…मां को बेटे के प्रति काम का क्या संबंध?
लेकिन जैसा मैंने कहा कि पुरूष और स्त्री पति और पत्नी एक क्षण के लिए मिलते है, एक क्षण के लिए दोनों की आत्माएं एक हो जाती है। और उस घड़ी में जो उन्हें आनंद का अनुभव होता है। वही उनको बांधने वाला हो जाता है।
कभी आपने सोचा कि मां के पेट में बेटा नौ महीने तक रहता है। और मां के आस्तित्व से मिला रहता है। पति एक क्षण को मिलता है। बेटा नौ महीने के लिए होता है इक्ट्ठा होता है। इसीलिए मां का बेटे से जो गहरा संबंध है, वह पति से भी कभी नहीं होता। हो भी नहीं सकता। पति एक क्षण के लिए मिलता है आस्तित्व के तल पर, जहां एग्ज़िसटैंस है, जहां बीइंग है, वहां एक क्षण को मिलता है, फिर बिछुड़ जाता है। एक क्षण को करीब आते है ओर फिर कोसों का फासला शुरू हो जाता है।
लेकिन बेटा नौ महीने तक मां की सांस से सांस लेता है। मां के ह्रदय से धड़कता है। मां के खून, मां के प्राण से प्राण, उसका अपना कोई आस्तित्व नहीं होता है। वह मां का एक हिस्सा होता है। इसीलिए स्त्री मां बने बिना कभी भी पूरी तरह तृप्त नहीं हो पाती। कोई पति स्त्री को कभी तृप्त नहीं कर सकता। जो उसका बेटा उसे कर देता है। कोई पति कभी उतना गहरा कन्टेंटमेंट उसे नहीं दे पाता जितना उसका बेटा उसे दे पाता है।
स्त्री मां बने बिना पूरी नहीं हो पाती। उसके व्यक्तित्व का पूरा निखार और पूरा सौंदर्य उसके मां बनने पर प्रकट होता है। उससे उसके बेटे के आत्मिक संबंध बहुत गहरे होते है।
और इसीलिए आप यह भी समझ लें कि जैसे ही स्त्री मां बन जाती है। उसकी सेक्स में रूचि कम हो जाती है। यह कभी आपने ख्याल किया है। जैसे ही स्त्री मां बन जाती है, सेक्स के प्रति रूचि कम हो जाती है। फिर सेक्स में उसे उतना रस नहीं मालूम पड़ता। उसने एक और गहरा रस ले लिया है। मातृत्व का। वह एक प्राण के साथ और नौ महीने तक इकट्ठी जी ली है। अब उसे सेक्स में रस नहीं रह जाता है।
अकसर पति हैरान होते है। पिता बनने से पति में कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन मां बनने से स्त्री में बुनियादी फर्क पड़ जाता है। पिता बनने से पति में कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि पिता कोई बहुत गहरा संबंध नहीं है। जो नया व्यक्ति पैदा होता है उससे पिता का कोई गहरा संबंध नहीं है।पिता बिलकुल सामाजिक व्यवस्था है, सोशल इंस्टीटयूशन है।
धर्म ओर हम
Master says....कभी आपने देखा होगा, कोई आदमी एक मशाल हाथ में ले ले और जोर से घुमाने लगे, तो एक फायर सर्किल बन जाता है, एक अग्नि—वृत्त बन जाता है। दिखाई पड़ने लगता है कि आग का एक गोल घेरा है। गोल घेरा कहीं भी नहीं है, सिर्फ एक मशाल है जो जोर से घूम रही है। अगर आप पास जाकर गौर से देखें, तो गोल घेरा मिट जाएगा, रह जाएगी मशाल। लेकिन तेजी से घूमने की वजह से मशाल गोल घेरा मालूम होती है आग का। दूर से देखने पर लगता है कि आग का वृत्त है, गोल घेरा है। है कहीं भी नहीं, लेकिन दिखाई पड़ता है। लेकिन अगर निकट जाकर पहचानें, तो पता चलेगा कि जोर से घूमती हुई मशाल है। वृत्त झूठ है, अग्नि—वृत्त झूठ है। ऐसे ही ये भीतर अगर हम गौर से जाकर देखेंगे, तो पता चलेगा कि मैं बिलकुल ही झूठ है। तेजी से घूमती हुई चेतना के कारण मैं का भ्रम पैदा हो जाता है, जैसे तेजी से घूमती हुई मशाल के कारण वृत्त का भ्रम पैदा हो जाता है। यह एक वैज्ञानिक सत्य है, जो समझ लेना चाहिए।
शायद आपको खयाल भी न हो कि हमारे जीवन के सारे भ्रम तेजी से घूमने के भ्रम हैं। दीवाल ठोस दिखाई पड़ती है, पत्थर पड़ा है पैर के नीचे, कितना साफ और ठोस है। लेकिन वैज्ञानिक कहते हैं कि ठोस पत्थर जैसी कोई चीज है ही नहीं। तब तो हम बड़ी मुश्किल में पड़ जाएंगे। क्या आपको पता है कि वैज्ञानिक मैटर के, पदार्थ के जितने ही पास गया, उतना ही पदार्थ विलीन हो गया। जब तक दूर था, तो समझता था कि पदार्थ है। और सबसे ज्यादा वैज्ञानिक ही घोषणा करता था कि पदार्थ ही सत्य है। लेकिन अब वैज्ञानिक ही कहता है कि पदार्थ तो है ही नहीं। तेजी से घूमते हुए विद्युत—क्या इतनी तेजी से घूम रहे हैं कि उनकी तेजी से घूमने की वजह से ठोसपन का भ्रम पैदा होता है। ठोसपन कहीं भी नहीं है।
जैसे बिजली का पंखा जोर से घूमता है तो उसकी तीन पंखुड़ियां दिखाई नहीं पड़ती हैं। फिर कोई गिनकर बता नहीं सकता है कि पंखुड़ियां कितनी हैं। और तेजी से घूमे, और तेजी से घूमे तो फिर हमें लगेगा कि एक टीन का गोल चक्कर घूम रहा है। फिर पंखुड़ियां दिखाई ही नहीं पड़ेगी। इतने तेजी से भी घुमाया जा सकता है उसे कि आप उसके ऊपर बैठ जाएं और आपको ऐसा पता न लगे कि पंखुड़ियां बीच से आ रही हैं, जा रही हैं। आपको ऐसा ही लगेगा कि मैं किसी ठोस चीज पर बैठा हुआ हूं। अगर इतनी तेजी से घूमे कि एक पंखुड़ी जाए, उसके पहले दूसरी पंखुड़ी आपके नीचे आ जाए, तो आपको कभी पता नहीं चलेगा कि आपके बीच —बीच में खड्डे भी आते हैं। पंखा इतनी तेजी से घूमे तो आपको पता नहीं चलेगा।
पदार्थ में उतनी ही तेजी से घूम रहे हैं उसके कण। और कण पदार्थ नहीं है, कण सिर्फ विद्युत ऊर्जा है, इलेक्ट्रिक इनर्जी है, वह तेजी से घूम रही है। घूमने की वजह से ठोसपन का भाव दे रही है। सारा पदार्थ सिर्फ तेजी से घूमती हुई ऊर्जा का फल है। दिखाई पड़ता है, है कहीं भी नहीं। ठीक ऐसे ही चित्त की ऊर्जा, इनर्जी आफ काशसनेस इतनी तेजी से घूम रही है कि मैं का भ्रम पैदा होता है।
दो भ्रम हैं जगत में, एक पदार्थ का भ्रम, मैटर का भ्रम और दूसरा मैं का भ्रम, ईगो का, अहंकार का भ्रम। ये दोनों भ्रम एकदम ही झूठे हैं, लेकिन इनके पास जाने से पता चलता है कि ये नहीं हैं। विज्ञान पदार्थ के पास गया तो पदार्थ विलीन हो गया। और धर्म मैं के पास गया, तो मैं विदा हो गया। धर्म की खोज है कि मैं नहीं है और विज्ञान की खोज है कि पदार्थ नहीं है। जितने निकट जाते हैं, उतना ही भ्रम टूट जाता है।
तो इसलिए मैं कहता हूं कि भीतर जाएं, निकट करीब से भीतर देखें, वहा कोई मैं है? और मैं नहीं कहता कि— ऐसा मान लें कि मैं नहीं हूं। अगर मान लिया तो झूठ हो जाएगा। मैं नहीं कहता हूं। मेरी बात अगर मानकर आप चल गए और आप ऐसा सोचने लगे कि मैं नहीं हूं, अहंकार झूठ है, मैं तो आत्मा हूं, मैं तो ब्रह्म हूं अहंकार नहीं है, तो आप गड़बड़ में पड़ गए। क्योंकि आप यह दोहरा रहे हैं तो फिर यह झूठ ही दोहराएंगे आप। मैं यह नहीं कहता हूं कि आप ऐसा दोहराएं। मैं यह कहता हूं कि आप भीतर जाएं, देखें, पहचानें। जो पहचानता है, देखता है, वह पाता है कि मैं नहीं हूं। फिर कौन है? जब मैं नहीं हूं कोई तो है। मेरे न होने से कोई भी नहीं है, ऐसा नहीं। क्योंकि भ्रम को जानने के लिए भी कोई तो चाहिए। भ्रम भी पैदा हो जाए, इसके लिए कोई तो चाहिए।
मैं नहीं हूं, फिर कौन है? फिर जो शेष रह जाता है, उसका अनुभव ही परमात्मा का अनुभव है। लेकिन उसका अनुभव एकदम विस्तीर्ण हो जाता है। मेरे गिरते ही तू भी गिर जाता है, वह भी गिर जाता है, फिर एक सागर ही रह जाता है चेतना का। उस स्थिति में दिखाई पड़ेगा कि परमात्मा ही है। तब तो शायद यह कहना भी गलत मालूम पड़े कि परमात्मा ही है। क्योंकि यह कहना भी पुनरुक्ति है। जब हम कहते हैं गाड इज, ईश्वर है, तो हम पुनरुक्ति कर रहे हैं। पुनरुक्ति इसलिए कर रहे हैं कि जो है, उसी का दूसरा नाम ईश्वर है। है का ही दूसरा नाम ईश्वर, है। इसलिए ईश्वर है, ऐसा एक ही चीज को दोहराना है, यह टोटॉलाजी है। एक ही बात को दोबारा कहना है। ठीक नहीं है यह बात।
ईश्वर है का क्या मतलब? हम है उस चीज को कहते हैं जो नहीं है भी हो सकती हो। हम कहते हैं, टेबिल है, क्योंकि कल टेबिल नहीं हो सकती है और कल टेबिल नहीं थी। जो चीज नहीं थी, फिर नहीं हो सकती है, उसको है कहने का कोई मतलब है। लेकिन ईश्वर न तो ऐसा है कि कभी नहीं था और न ऐसा हो सकता है कि कभी नहीं होगा। उसे है कहने का कोई भी मतलब नहीं। वह है हां, असल में जो है, उसका ही वह दूसरा नाम है। होने का ही दूसरा नाम परमात्मा है। एक्सिस्टेंस, अस्तित्व का ही दूसरा नाम परमात्मा है।
मेरी दृष्टि में, अगर हमने इस जो है, इस पर अपने परमात्मा को थोपा तो हम झूठ में उतर जाएंगे। और ध्यान रहे, परमात्मा भी अपने — अपने ट्रेड मार्क के अलग— अलग हैं। हिंदू का अपना है थोपने के लिए, मुसलमान का अपना है, ईसाई का अपना है, जैन का अपना है, बौद्ध का अपना है। सबके अपने— अपने शब्द हैं, अपने — अपने परमात्मा हैं। परमात्मा का भी बड़ा गृह उद्योग खुला हुआ है। अपने — अपने घर में परमात्मा को डाला जा सकता है। होम इंडस्ट्री है उसकी। अपने — अपने घर में ढालो, अपने — अपने परमात्मा का निर्माण करो।
और फिर ये परमात्माओं को ढालने वाले वैसे ही बाजार में लड़ते हैं, जैसे सभी अपने — अपने घर में सामान डालने वाले बाजार में, दुकानों पर लड़ते हैं। ऐसे बाजार में वे भी लड़ते हुए दिखाई पड़ते हैं। एक —दूसरे का परमात्मा भी भिन्न पड़ जाता है। असल में जब तक मैं हूं तब तक मैं जो भी करूंगा वह आपसे भिन्न होगा। जब तक मैं हूं, मेरा धर्म भिन्न होगा, मेरा ईश्वर भिन्न होगा, क्योंकि वे मेरे मैं के निर्माण होंगे। मैं भिन्न हूं इसलिए मेरा सब भिन्न होगा।
अगर दुनिया में ठीक—ठीक धर्म —निर्माण करने की स्वतंत्रता हो तो जितने आदमी हैं, उतने ही धर्म होंगे। इससे कम नहीं हो सकते। वह तो ठीक—ठीक स्वतंत्रता नहीं है।`
प्रेम अभय है।
⛵एक युवक अपनी नववधु के साथ समुद्र-यात्रा पर था। सूर्यास्त हुआ, रात्रि का घना अंधकार छा गया और फिर एकाएक जोरों का तूफान उठा। यात्री भय से व्याकुल हो उठे। प्राण संकट में थे और जहाज अब डूबा, तब डूबा होने लगा। किंतु वह युवक जरा भी नहीं घबड़ाया।
उसकी पत्नी ने आकुलता से पूछा, 'तुम निश्चिंत क्यों बैठे हो? देखते नहीं कि जीवन बचने की संभावना क्षीण होती जा रही है! 'उस युवक ने अपनी म्यान से तलवार निकाली और पत्नी की गर्दन पर रखकर कहा, 'क्या तुम्हें डर लगता है?'
वह युवती हँसने लगी और बोली, 'तुमने यह कैसा ढोंग रचा? तुम्हारे हाथ में तलवार हो, तो भय कैसा!' वह युवक बोला, 'परमात्मा के होने की जब से मुझे गंध मिली है, तब से ऐसा ही भाव मेरा उसके प्रति भी है, तो भय रह ही नहीं जाता है।'
प्रेम अभय है। अप्रेम भय है। जिसे भय से ऊपर उठना हो, उसे समस्त के प्रति प्रेम से भर जाना होगा। चेतना के इस द्वार से प्रेम भीतर आता है, तो उस द्वार से भय बाहर हो जाता है। "
भोजन के साथ बेहोशी क्यों आ जाती है?
Master says ...भोजन के साथ बेहोशी क्यों आ जाती है?
क्योंकि जैसे ही पेट में भोजन जाता है, मस्तिष्क में जो ऊर्जा साधारणतः काम करती है--जो शक्ति, वह पेट खींच लेता है।
क्योंकि पेट को पचाने की जरूरत पड़ती है, तो सारे शरीर से शक्ति को पेट खींच लेता है
क्योंकि भोजन को पचाना है, पेट की अग्नि को ठीक से जलना है।
और मस्तिष्क बड़ी सूक्ष्म शक्ति से चलता है। होश सूक्ष्मतम शक्ति है।
जैसे ही पेट में भोजन गया कि मस्तिष्क की शक्ति पेट की तरफ उतर जाती है। बस, सिर झपकी खाने लगता है, नींद आने लगती है।
वह जो नींद आ रही है, वह इस बात का सबूत है कि जो शक्ति मस्तिष्क को चलने के लिए चाहिए, वह नहीं मिल रही।
और पेट शरीर का केंद्र है।
मस्तिष्क से शक्ति ली जा सकती है। मस्तिष्क को शक्ति तो पेट तभी देता है, जब उसके पास अतिरिक्त होती है। मस्तिष्क गौण है पेट के लिये।
इसलिये ज्यादा भोजन करने वाले लोग बहुत प्रखर बुद्धि के नहीं होते।
और एक बड़ी हैरानी की बात है कि ज्यादा भोजन करने वाले लोग न तो प्रखर बुद्धि के होते हैं और न ज्यादा जीते हैं; जल्दी मर जाते हैं।